किसकी 'उम्मीद' बनेगा नया वक्फ कानून!
संसदीय इतिहास में संभवतः पहली बार ऐसा हो रहा है किसी धार्मिक समुदाय खासकर मुसलमानों के मामलों पर इतनी खुलकर बात हो रही है. अब तक तुष्टीकरण राजनीतिक दलों की प्रिय रणनीति रही है. अनुच्छेद 370, ट्रिपल तलाक , सीएए जैसे मामलों के बाद वक्फ बिल लाकर सरकार ने इन सभी मामलों में अपने इरादे खुलकर जाहिर कर दिए हैं. अब तक इन मुद्दों को विवादास्पद मानकर राजनीतिक दल इससे कन्नी काट लेते थे.
हमें जो रिलिजियस इंस्टीट्यूशन बनाने का अधिकार संविधान से मिला था आप उसे छीन रहे हैं.आप सीधा संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं, हमें यह बिल्कुल मंजूर नहीं है. यह बिल सरकार की कब्र में नकेल बनेगा. हमें दिक्कत सरकार की नियत से है, इससे मुस्लिमों का कोई फायदा नहीं होने वाला है.
अब बात वक्फ बिल यानि यूनाइटेड वक़्फ़ मैनेजमेंट एम्पावरमेंट, एफ़िशिएंसी एंड डेवलपमेंट एक्ट-1995 अर्थात संक्षेप में इससे उम्मीद की… लोकसभा और राज्यसभा में हाल के कई सालों में ऐसा पहली बार हुआ कि किसी एक बिल पर दोनों सदनों में करीब 12 घंटे से अधिक लगातार बहस हुई. चर्चा का यह आलम यह रहा कि देर रात दो बजे के बाद ही बिल पारित हुआ. दोनों सदनों में पक्ष और विपक्ष के सांसद तब तक सदन में डटे रहे, जब तक बिल पर अंतिम फैसला नहीं हुआ. इसका असर पक्ष और विरोध में पड़े वोटों में साफ देखा जा सकता है. लोकसभा और राज्यसभा में बिल को लेकर जमकर बहस हुई. कांग्रेस , टीएमसी, सपा , डीएमके राजद , शिवसेना ( यूबीटी ) , आप समेत इंडिया गठबंधन के सारे दलों ने इस बिल का विरोध किया.
वहीं बीजेपी के साथ जेडीयू , टीडीपी , एलजेपी और लोकदल जैसे दलों ने बिल का समर्थन किया. सरकार का यह कहना है कि इस बिल का धर्म से कोई लेना देना नहीं है. बस वह प्रॉपर्टी को मैनेज करने के लिये कानून लेकर आई है. तो विपक्ष कह रहा है कि यह संविधान विरोधी है. अगर यह धर्म विरोधी नहीं है तो क्यों एक ही समुदाय को लेकर तमाम तरह के बिल लाये जा रहे है.
विपक्ष केवल भम्र फैलाने का काम कर रहा है. सीएए को लेकर ऐसा ही भ्रम फैलाया कि नागरिकता चली जाएगी पर वह नागरिकता देने वाला कानून है. क्या किसी की नागरिकता गई? इसको लेकर पूरे देश में आगजनी का माहौल बना सो अलग. इसी तरह धारा 370 और संविधान को लेकर माहौल बनाया गया.
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चिराग पासवान
केन्द्रीय मंत्री
बिल पर चर्चा के दौरान विपक्ष पर सबसे ज्यादा तीखा हमला केंद्री गृह मंत्री अमित शाह ने बोला. उन्होंने जोर देकर कहा कि आज अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में भय पैदा करने का फैशन बन गया है. इसके जरिए विपक्ष अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश रहा है. उन्होने साफ किया कि मुस्लिम भाइयों के धार्मिक क्रियाकलाप और उनके बनाए हुए दान से जुड़े ट्रस्ट यानि वक्फ में सरकार कोई दखल नहीं देना चाहती. वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खऱगे ने कहा कि वक्फ संशोधन बिल के बारे में देश में ऐसा माहौल बना है कि यह बिल अल्पसंख्यकों को तंग करने के लिए लाया गया है. खरगे ने कहा कि विभिन्न दलों के विरोध के बाद भी मनमानी से यह बिल लाया गया है. ये जिसकी लाठी उसकी भैंस - किसी के लिये ठीक नहीं होगा.
'मैं इस कानून को नहीं मानता'
असदुद्दीन ओवैसी ने भी वक्फ संशोधन बिल पर केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा. इतना ही नहीं ओवैसी ने तो लोकसभा में यह कहते हुए बिल को फाड़ दिया कि गांधीजी के सामने जब एक ऐसा कानून लाया गया, जो उनको कबूल नहीं था तो उन्होंने उसे फाड़ दिया था. इसलिए मैं भी इस कानून को नहीं मानता और गांधी जी की तरह इसे फाड़ता हूं. इसके बाद दो पन्नों को बीच में लगे स्टेपल से उन्होंने अलग कर दिय़ा.
पिछले साल आठ अगस्त को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल पेश किया. विपक्षी सदस्यों और खासकर सहयोगी दलों जेडीयू , टीडीपी, एलजेपी और राष्ट्रीय लोकदल के विरोध को देखते हुए सरकार ने इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति को भेजने का फैसला किया. बीजेपी के जगदंबिका पाल इस समिति के अध्यक्ष बनाये गए. अलग-अलग दलों के 31 सांसदों को समिति में रखा गया. जेपीसी की 38 बैठकें हुईं और 113 घंटे चर्चा हुई. 284 डेलिगेशन के साथ जेपीसी मिली.
वक्फ बिल: संसद में कितने वोट मिले
लोकसभा | राज्यसभा |
पक्ष- 288 | पक्ष-128 |
विपक्ष- 232 | विपक्ष-95 |
'यह ऐतिहासिक दिन है'
देशभर से लगभग एक करोड़ ऑनलाइन सुझाव आए जिसके आधार पर यह कानून बना. बिल में जेपीसी के 14 संशोधनों को मंजूरी मिली है. इसमें जेडीयू और टीडीपी जैसे सहयोगियों के तीन सुझावों को शामिल किया गया कि वक्फ का कानून पिछली तारीख से लागू नहीं होगा, वक्फ बोर्ड में कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी होंगे और वक्फ संबधी दस्तावेज को पोर्टल में अपलोड करने के लिये अधिक समय दिया जाएगा. लेकिन विपक्ष ने इन तमाम संशोधनों को खारिज कर दिया. बिल पास होने पर जगदंबिका पाल ने कहा, " यह ऐतिहासिक दिन है. निश्चित तौर पर आज देश के गरीब अल्पसंख्यक, पसमांदा मुस्लिम या खबातीन महिलाएं और ऑर्फ़न बच्चे हैं जिनको अभी तक वक्फ का फायदा नहीं मिल रहा था, उनको अब फायदा मिलेगा.
वैसे कईयों को यह भी अखरा कि वक्फ संशोधन बिल पर गांधी फैमली के किसी भी सदस्य ने सदन में चर्चा के दौरान एक भी शब्द नहीं बोला. राहुल और प्रियंका लोकसभा के सदस्य हैं और सोनिया गांधी राज्यसभा की सदस्य हैं. दोनों सदनों में चर्चा से लेकर मतदान तक तीनों सदस्य सदन में मौजूद रहे पर बहस में हिस्सा नहीं लिया. ये बात कइयों को हज़म नहीं हुई. हालांकि, जानकर बताते है कि गांधी फैमली ने जानबूझकर सोची समझी रणनीति के तहत वक्फ संशोधन बिल पर हुई चर्चा में हिस्सा नहीं लिया. कहीं ना कहीं वह बिल के विपक्ष में बोलकर केवल मुस्लिम के पैरोकार नहीं बनना चाहते थे और न पक्ष में बोलकर हिंदुओं के विरोध में दिखना चाहते थे. हालांकि बाद में सोनिया गांधी ने कांग्रेस संसदीय बोर्ड की बैठक में ये जरूर कहा कि यह विधेयक संविधान पर बेशर्मी से किया गया एक हमला है. यह हमारे समाज को स्थायी रूप से तोड़ने की भाजपा की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.
वक्फ बिल से किसको होगा फायदा?
वक्फ बिल को लेकर विपक्ष भले ही बीजेपी पर जो भी आरोप लगाए पर यह तो अब साफ हो गया कि बीजेपी अपने पिच पर चौके-छक्के मारने से नहीं चूकती. पहले अनुच्छेद 370, ट्रिपल तलाक , सीएए जैसे विवादस्पद मुद्दों को उठाने से राजनीतिक दल परहेज करते थे. लेकिन बीजेपी ने ना केवल ऐसे बिल पारित करवाए बल्कि अपने हिसाब से नैरेटिव भी सेट किए. अपने ऊपर सांप्रदायिक होने के आरोपों से उलट वह अपने आप को सेक्युलर बताने में लगी हैं. ट्रिपल तलाक के जरिये मुस्लिम महिलाओं को साधा तो वहीं वक्फ के जरिये गरीब मुसलमानों पर फ़ोकस किया.
पसमांदा समाज हमेशा से मुस्लिम समाज में दबा कुचला वर्ग रहा है. इस तरह के बिल के जरिए भाजपा न केवल देश में जातपात आधारित दलों की नींव में मठ्ठा डाल रही है बल्कि अपने लिए नया वोट बैंक भी तैयार कर रही है. यह बात पहले के तमाम चुनावों में साबित हो चुकी है. अब आने वाले बिहार चुनाव में इस बिल का भी लिटमस टेस्ट हो जाएगा. बहरहाल, वक्फ बिल पर दोनों ओर के अपने-अपने दावे हैं. अब देखना यह होगा कि जनता किस पर भरोसा करती है.
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